
दिल्ली के सफदरजंग मकबरे को बुधवार शाम को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर नीली रोशनी से सजाया गया। यह पहल ऑटिज्म सेंटर फॉर एक्सीलेंस (ACE) द्वारा की गई है, जो वर्ष 2013 से ऑटिज्म के प्रति जागरूकता फैलाने में सक्रिय है। इस आयोजन का उद्देश्य ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को सम्मान और स्वीकृति प्रदान करना है। ‘लाइट इट अप ब्लू’ अभियान के तहत दुनिया भर के प्रमुख स्मारकों को नीले रंग में रोशन किया जाता है, जिससे समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जाता है।
शांति और स्वीकृति का प्रतीक
इस बार के आयोजन की थीम ‘ऑटिज्म और मानवता-हर जीवन का मूल्य’ रखी गई है। नीली रोशनी जो ऑटिज्म जागरूकता का वैश्विक प्रतीक है, समाज में समझ और स्वीकृति का संदेश देती है। स्मारक की रोशनी ने यह बताते हुए व्यक्त किया कि ऑटिज्म से जुड़े लोगों को समझना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना कितना आवश्यक है। इस पहल में सब्यता फाउंडेशन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भी योगदान दिया।
ACE का 11 साल का सफर
ऑटिज्म सेंटर फॉर एक्सीलेंस (ACE) पिछले 11 वर्षों से बच्चों और युवाओं के लिए विभिन्न कार्यक्रम चला रहा है। यह संस्था व्यक्तिगत और वैज्ञानिक तरीकों से शिक्षा और जीवन कौशल विकसित करने में मदद करती है। संस्था की संस्थापक डॉ. अर्चना नायर का कहना है कि ऑटिज्म से प्रभावित हर व्यक्ति में समाज का एक सक्रिय हिस्सा बनने की क्षमता होती है। यह लोग अपने तरीके से खुशी और संतुलन जीवन में लाते हैं।
जागरूकता बढ़ाने की कोशिश
इस आयोजन में शिक्षकों, परिवारों, समर्थकों और समुदाय के लोगों ने हिस्सा लिया। इस तरह की पहलों के जरिए समाज में जागरूकता बढ़ाने और ऑटिज्म से जुड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। आयोजनों का उद्देश्य है कि अधिक से अधिक लोग ऑटिज्म के बारे में जानें और इन लोगों को अपने समाज का हिस्सा मानें।
ऑटिज्म क्या है?
ऑटिज्म एक मानसिक स्थिति है, जो बचपन से विकसित होती है और पूरी जिंदगी रहती है। इससे प्रभावित व्यक्ति को बातचीत करने, अपनी बात समझाने और सामाजिक रिश्ते बनाने में कठिनाई होती है। ऑटिज्म से प्रभावित व्यक्ति अक्सर एक ही कार्य को दोहराते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में लगभग 1.8 से 2 करोड़ लोग ऑटिज्म से प्रभावित हैं। साथ ही, दुनिया भर में हर 100 में से 1 बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम पर है।
